उत्तराखंड हाई कोर्ट: बाल संरक्षण का मतलब किशोरावस्था को अपराध बनाना नहीं है।”

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 17 वर्षीय लड़की और करीब 21–22 वर्षीय युवक के प्रेम संबंध से जुड़े एक मामले में पॉक्सो एक्ट में दर्ज FIR और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। जस्टिस आलोक महरा की पीठ ने मामले में लड़की की उम्र, उसके स्वयं के बयान, दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे प्रेम संबंध और पक्षकारों के बीच हुए समझौते को महत्वपूर्ण माना, और इसी आधार पर युवक के विरुद्ध दर्ज पॉक्सो एक्ट की एफ आई आर को रद्द करने और साथ में इस प्रकरण में चल रही अन्य आपराधिक मामले को तुरंत रद्द करने का आदेश दिया है।

मामले की प्रमुख बातें:

• घटना के समय लड़की की उम्र 17 वर्ष 2 महीने थी।

• युवक की उम्र करीब 22 वर्ष बताई गई।

• दोनों के बीच एक वर्ष से अधिक समय से प्रेम संबंध था।

• लड़की ने अदालत में स्वयं उपस्थित होकर कहा कि संबंध बिना बल, दबाव या गलत प्रस्तुतीकरण के थे।

• दोनों ने बालिग होने के बाद विवाह करने की इच्छा जताई।

• अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए FIR और संबंधित आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं माना।

• युवक यदि किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा करने का निर्देश भी दिया गया।

अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि 17 वर्षीय और 21 वर्षीय व्यक्ति के बीच सहमति से बने संबंधों को यौन हमले के समान मानना महत्वपूर्ण अंतर को खत्म करता है और अनुच्छेद 14 के तहत स्पष्ट मनमानी की स्थिति पैदा कर सकता है।

कोर्ट की टिप्पणी — “बाल संरक्षण का मतलब किशोरावस्था को अपराध बनाना नहीं है।”

CASE: Aman Sagar Versus State of Uttarakhand | WPCRL/1543/2026

यह फैसला बाल संरक्षण कानून, सहमति, किशोरावस्था और आपराधिक न्याय के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस को सामने लाता है।

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