उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक महरा ने कहा कि यदि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हैं, तो NI Act की धारा 118(ए) और 139 के तहत कानूनी धारणा लागू होती है। चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने या हस्ताक्षर और लिखावट अलग होने मात्र से यह धारणा समाप्त नहीं होती।
मामले में ₹2 लाख का चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हुआ था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने केवल हस्ताक्षर किया हुआ खाली चेक दिया था, जिसका बाद में दुरुपयोग हुआ। हाईकोर्ट ने Bir Singh v. Mukesh Kumar में सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि केवल खाली चेक दिए जाने या उसके विवरण किसी और द्वारा भरे जाने का दावा पर्याप्त बचाव नहीं है। ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से ही कानूनी धारणा को खारिज किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
📌CASE: Ramesh Singh Nagarkoti v. State of Uttarakhand | Crl. Rev. No. 646 of 2026