काशीपुर : शहर में आए दिन आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओ की संख्या बढ़ती जा रही है। बीच सड़क पर खड़े गौ वंश ट्रैफिक समस्या उत्पन्न करने के साथ ही दुर्घटना का कारण बनते जा रहे हैं, इन सब समस्याओं की निवारण की जिम्मेदारी लेने वाला नगर निगम आँख, कान और मुहँ बंद कर बैठा है। कमाल की बात तो यह है की पिछले सप्ताह खुद नगर निगम मेयर के साथ निरीक्षण पर गए कर्मचारी भी आवारा पशु के कारण ही दुर्घटना का शिकार हुए और उन्हें गंभीर चोटें लगी थीं । लेकिन उसके बावजूद भी नगर निगम को यह समस्या या तो दिख नहीं रही है या निगम इस समस्या को देखना ही नहीं चाहता।
शहर की मुख्य सड़के हों या गली मोहल्ले हर जगह इस आवारा पशुओं का आतंक बढ़ता जा रहा है । द्रोणा सागर बाइपास रोड पर बने खतरनाक मोड़ो पर बीच सड़क पर खड़े आवारा पशुओं के कारण आए दिन दुर्घटनाए हो रही हैं, ऐसा नहीं है की यह सभी पशु आवारा हैं और इनका कोई स्वामी नहीं है, की गौ वंश पशुओं को तो उनके मालिक दूध निकालने के बाद रोज सड़कों पर खुला छोड़ देते हैं यही गौ कूड़ा कर्कट में से खाना ढूंढने के प्रयास में कचरा, पौलिथीन आदि खा लेते हैं जिसके कारण इनकी मृत्यु तक या जाती है। नगर निगम को चाहिए की पशुओं को खुला छोड़ने वाले ऐसे पशुपालकों की पहचान कर उन पर नगर निगम अधिनियम के अनुसार जुर्माना लगाए और कानूनी कार्यवाही करे, लेकिन अफसोस काशीपुर नगर निगम द्वारा इस संबंध में आज तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की है।गौ माता के नाम पर राजनीति करने वाले भाजपा शासित शहर में गौ माताओं की दुर्दशा जगह जगह कूढ़े के ढेरों के पास देखि जा सकती है।
जब की भारतीय कानून के अनुसार नगर निगम अधिनियम (Municipal Corporation Act): देश के लगभग सभी राज्यों के नगर निगम अधिनियमों के तहत यह नगर निगम की प्राथमिक और अनिवार्य (Obligatory) ड्यूटी में शामिल है कि वह अपने शहरी क्षेत्र की सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थलों को आवारा पशुओं (जैसे गाय, बैल, सांड, कुत्ते, सूअर आदि) से मुक्त रखे।
नागरिकों के जीवन की रक्षा करना और यातायात को सुगम बनाना निगम का कर्तव्य है। आवारा पशुओं के कारण होने वाले सड़क हादसे (Accidents) और जाम के लिए कानूनी रूप से निगम की जिम्मेदारी बनती है।
काशीपुर की जनता को भी पता होना चाहिए की यदि नगर निगम अपनी इस कानूनी जिम्मेदारी में विफल रहता है और आवारा पशुओं के कारण किसी नागरिक को गंभीर चोट लगती है या दुर्घटना में मृत्यु होती है, तो कई मामलों में अदालतें और मानवाधिकार आयोग नगर निगम को आर्थिक मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं।